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एकत्रित होकर महान कष्टकारी कलिकाल से त्रस्त होने वाले मानव के कल्याणार्थ एक समय नैमिषारण्य नामकवन में शौनक आदि अटठासी हजार ऋषिगण विचार विनिमय कर रहे थे। श्री सूत जी महाराज का आगमन हुआ। उन्हें देखकर समस्त ऋषियों ने उनका उठकर अभिवादन किया।
आवत हिय हुलसै नहीं, मन में प्रीत न होय।
श्री शिव वाको गेह में, कबहुँ न जइहो कोय।।
इसके अनन्तर अर्घ्य पाद्य आदि देकर शौनक आदि ऋषियों ने उनका यथोचित सम्मान किया। तदनन्तर उनसे निवेदन किया कि हे महाराज। हम सब लोग शोक-सागर में निमज्जित हो रहे थे। आपके आगमन से उद्धार का साधन सुलभ हो। गया। आपका आगमन उसी प्रकार है. जिस प्रकार डूबते हुए को नाका का आश्रय
इस प्रसंग में तुलसीदास जी ने लिखा है-
‘राम विरह सागर महँ, भरत मगन मन होत।
विप्र रूप धरि पवन-सुत, आइ गयो जिमि पोत।
शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना सुनकर श्रीसूत जी महाराज कहने लगे कि, हे महर्षियों! आप लोग धन्य हैं, क्योंकि आप लोगों के (हृदय) में परोपकार की भावना प्रादुर्भूत हुई है। यथार्थ में आप जैसे लोग ही शास्त्रों में ‘साधु’ शब्द से विभूषित किये गये हैं।
श्रीसूत जी ने कहा कि, हे महर्षियो! जैसा प्रश्न आप लोगों ने मुझसे किया है, इसी प्रकार का प्रश्न एकबार देवर्षि नारद जी ने भगवान विष्णु से भी किया था। और जिस प्रकार भगवान ने उनके प्रश्नों का उत्तर संध्योपासन के पश्चात ही दिया था, उसी प्रकार मैं भी संध्या वंदन के उपरांत ही आप लोगों के प्रश्नों का उत्तर दूँगा। ऋषियों ने कहा-ठीक है महाराज, तब तक हम लोग भी संध्यादि कर्म से निवृत्त हो लें।
नारद जी ने कहा- हे भगवान! मैं मृत्युलोक में गया था और वहीं से आ रहा हूँ। वहाँ पर मैंने संपूर्ण प्राणियों को अनेक क्लेशों से क्लेशित पाया। वे सभी मनुष्य नाना प्रकार की योनियों में उत्पन्न होकर अपने अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं।
“दीन दयाल बिरद सम भारी। हरहु नाथ मम संकट भारी”
भगवान ने कहा-हे नारद! आपने अच्छा प्रश्न किया है। इससे संसार के सभी प्राणियों का कल्याण होगा और मनुष्य समस्त पापों से छूटकर मोक्ष-धाम को प्राप्त होंगे। हे नारद जी, इस नश्वर शरीर को परोपकार के कामों में ही लगाना चाहिए।
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहि विषय अनुरागी।
देह बरे करयह फल भाई। भजिय राम सब काम बिहाई ।।
इसलिए, हे मुनिश्वर। आपको मैं एक छोटी-सी युक्ति बतलाता हूँ, उसे सावधानहोकर सुनें।
एक ऐसा व्रत बतलाता हूँ जो त्रैलोक्य में दुर्लभ है और अत्यंत फलदायक है। हे नारद जी, इस व्रत को मैं आपके स्नेह के कारण प्रकट कर रहा हूँ। इस उत्तम व्रत के प्रभाव को कलियुग के प्राणियों का मंगल होगा।
चौपाई – “कलि केवल एक हरिगुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा”
हे नारद जी, जो लोग इस कलिकाल में श्री विष्णु भगवान का विधिपूर्वक व्रत और पूजन करेंगे, वह इस लोक में शीघ्र ही सुख के भागी होंगे और अंत में परमधाम को प्राप्त होंगे। क्योंकि अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों का फल मनुष्य को शीघ्र ही मिलता है।
भगवान के मुख से ऐसी बात सुनकर ऋषियों ने पूछा- हे भगवान्। इस व्रत का क्या फल है? किस विधि से करना चाहिए? किसी समय में करना चाहिए तथा इस व्रत को पूर्व काल में किसने किया था? कृपया इन सब बातों की आप मुझसे विस्तृत
विवेचना कीजिए?
नारद जी का ऐसा प्रश्न सुनकर भगवान ने कहा- हे नारद, यह व्रत समस्त संतापों का नाशक और धन-धान्य प्रवर्धक है। इसके अतिरिक्त इस व्रत के प्रभाव से सौभाग्य की वृद्धि, संतान की प्राप्ति और सर्वत्र विजय लाभ होता है। इस व्रत के करने का दिन द्वितीय (दौज) है, इस दिन इस व्रत को भक्तिभाव से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाता है। अपने सामर्थ्य के अनुसार भगवान विष्णु की स्वर्ण प्रतिमा बनाए अथवा सालिग्राम की ही मूर्ति हो। उस प्रतिमा को मध्य कलश या सिंहासन पर स्थापित करें। पंचामृत (1. गाय का दूध, 2. दही. 3. घी. 4. मधु, 5. शक्कर) से स्नान कराकर दो वस्त्रों से आवेष्ठित करें। फिर वस्त्रों से परिवेष्टित उस प्रतिमा को तांबे के पात्र में स्थापित करें। और स्वस्तिवाचन पूर्वक उस प्रतिमा की प्रतिष्ठा करें और शालिग्राम की मूर्ति को कलश पर स्थापित करें।
तत्पश्चात् चंदन, गंध, द्रव्य, पुष्प, ऋतु फल, अर्थात् उस मौसम में जो फल मिल सके ले लें। और धूप दीप, नैवेद्य तथा ताम्बूल आदि समर्पित कर भगवान का पूजन करें। ब्राह्मण, बन्धु-बान्धव आदि को आमंत्रित करके धर्म में आस्था रखकर पूजन करें। भक्ति पूर्वक सवा मन, सवा पाँच सेर या सवा सेर नैवेद्य अर्पित करें। नैवेद्य में पका केला, गोघृत, गोदुग्ध और शक्कर मिश्रित गेहूँ का आटा, यदि गेहूँ का आटा और शक्कर न मिले तो चावल का आटा और गुड़ लेकर खीर बनाए।
सब वस्तुओं को सवाया मात्रा में एकत्रित करके भगवान को अर्पण करें। दोज व्रत कथा तथा अपने कटुम्बियों के साथ कथा श्रवण करें। इसके बाद बान्धवों क सहित ब्राह्मण को भोजन करावे। प्रसाद ग्रहण करने के बाद भजन कीर्तन आदि करें। घर जाते समय मन में भगवान विष्ण का स्मरण करता हुआ जाय। इस प्रकार करने से मनुष्य को अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है। विशेष करके कलिकाल में इसम बढ़कर कल्याणकारी और सरल उपाय इस पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।
श्री सुत जी ऋषियों से तथा भगवान नारद जी से व्रत का विधान और महात्म्य वर्णन करने के बाद श्री द्वितीया व्रत के व्रती (दौज का विधान के संबंध में कहते हैं कि –
पूर्वकाल में राजा चमत्कार बहुत दानवीर राजा था। उसने अपने राज्य को कुछ भूमि को विद्वानों को दान कर दिया तब से इस स्थान का नाम चमत्कारपर पड़ा। प्राचीन काल मे राजा विदुरथ नाम से प्रसिद्ध एक हैहयवंशी (हैहयवंशी राजा यादव कहलाये) राजा हुए जो बडे-बडे यज्ञ एवं दानपति तथा प्रत्येक कार्य में दक्ष थे विदरथ राजा ने अपने तप के बल से इस क्षेत्र में रहने वाली आत्माओं का जो कर्मलित दोष से दुःख पा रही थी उनका उद्धार किया। उन्होंने विदुरथ शहर बसाया जो चमत्कारपुर के नजदीक था। इस सिद्ध स्थान पर मुनियों के आश्रम हुआ करते थे।
इसी चमत्कार पुर में पूर्वकाल में संत रामकृष्ण नामक एक बहुत बड़े मुनि थे। उनकों खड़े होकर तपस्या करते कई वर्ष बीत गये। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने कहा कि मैं यहाँ प्रकट हुआ है तो यह कृष्णतीर्थ के नाम से जाना जायेगा। और जो मनुष्य कृष्णतीर्थ में स्नान करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते
एक समय की बात है-पूर्वकाल में वाष्पकलि नामक दानवों का राजा था। उसने दैत्यों की सेना के साथ देवलोक पर चढ़ाई की। अंत में दानव वाष्पकलि ने देवराज
इन्द्र पर विजय पाई। देवराज इन्द ने स्वर्ग का सिहासन छोडकर देवताओं के साथ भगवान विष्ण की शरण ली। जहाँ शेषनाग की शैय्या पर श्री हरि योगनिद्रा को स्वीकार करके शयन करते हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा में संलग्न रहती है। वहाँ पहुंचकर देवताओं ने भगवान् विष्णु की स्तुति की। श्री हरि शैय्या से उठकर इन्द्र से बोले तीनों लोक कुशल तो है? तुम सम्पूर्ण देवताओं को साथ लेकर यहाँ से वरदान पाकर बड़ा बलवान हो गया है। वह देवताओं द्वारा अजेय है उसने युद्ध कैसे आये हो? इन्द्र ने विष्णु भगवान से कहा कि दैत्यराज वाष्पकलि भगवान शंकर भूमि मे मुझे परास्त कर दिया है। मधुसुदन वह इस समय स्वर्ग लोग में निवास करता है। इस तरह में सम्पूर्ण देवताओं के साथ अपकी शरण में आया है। श्री भगवान बोले-हे इन्द्र! तुम कही सिद्ध तीर्थ में रहकर बडी भारी तपस्या करो। इस समय चमत्कार पर का तेज सिद्धिदायक हे तुम वहीं जाकर तपस्या करो। समय आने पर में उस दानव को दंड दूँगा।

जलशायी भगवान विष्णु की स्तुति
इन्द्र ने कहा- केशव। हम दानव राज वाष्पकलि से डरे हुए है अतः आपके बिना वहाँ नहीं जायेंगे इसलिए आप स्वयं भी वहाँ चलियें आपसे सुरक्षित होकर मैं वहाँ भारी तपस्या कर सकूँगा।
भगवान विष्णु ने ‘एवमस्तु’ कहकर देवताओं और लक्ष्मी के साथ चमत्कारपुर में पदार्पण किया। उस समय सभी देवताओं ने अपने-अपने लिए पृथक-पृथक आश्रम बनाए। भगवान विष्णु ने वहाँ के प्राचीन कुंड में क्षीरसागर का आह्वान किया और श्वेतद्वीप की भाँति वहाँ निवास करने लगे। उस समय सभी देवता उनके चारों ओर विनीत भाव से खड़े होकर उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर पूर्णिमा मास की गणना के अनुसार श्रावण कृष्ण द्वितीया (दौज तिथि) का शुभ दिवस आने पर बृहस्पति जी ने इन्द्र से कहा कि यह द्वितीया (दौज) भगवान विष्णु की सर्वप्रिय तिथि है।

भगवान लक्ष्मी नारायण का दर्शन
जलशायी विष्णु का पूजन किया। और इस प्रकार चार महीने तक दौज (द्वितीय) यह सुनकर देवराज इन्द्र ने शास्रोक्त विधि से दौज (द्वितीया) का तक से सम्पन्न हो गये। तब तेज स्वरूप इन्द्र को देखकर भगवान विष्णु बड़े प्रसन्न ह के दिन वे श्री हरि का पूजन करते रहे इस दौज को व्रत के कारण इन्द्रदेव दिव्य और बोले इन्द्र अब तुम देवताओं के साथ मिलकर वाष्पकलि का वध करन जाने तुम्हारी विजय होगी। भगवान् विष्णु के दिये हुए आशीर्वाद एवं दीज व्रत के प्रद से देवराज इन्द्र ने वाष्पकलि का सम्पूर्ण दानवों सहित संहार कर डाला और का सिंहासन प्राप्त किया।

भगवान लक्ष्मी नृसिंह का दर्शन
इन्द्र ने भगवान विष्णु से कहा हे प्रभु मेरे लिए तथा सम्पूर्ण लोकों का हित क के लिए उपदेश दीजिए। तब विष्णु भगवान ने कहा हे इन्द्र इस कुडे में मे निवास करूंगा और इन पवित्र जल में जो व्यक्ति स्नान करेगा उसके संकट दूर होंगे।
जो व्यक्ति दीज (द्वितीया) का व्रत करके भक्तिपूर्वक यहाँ आकर मेरी पुजा करेगा वह मनुष्य मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेगा। जिन माता-बहनों की गोद पुत्र रत्न से वचित है उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। तथा कोई माता-पुत्र के बगैर और बहन भाई के बगैर नहीं रहेगी। निर्धन को धन की प्राप्ति होगी। असाध्य रोगों से मुक्ति मिलेगी। अंधे को नेत्र ज्योति प्रदान होगी। (स्कन्द पुराण नागरखंड-पूर्वाद्ध)
कलयुग में 88,000 ऋषियों ने गंगा के किनारे एकत्र होकर सृष्टि कल्याण के लिए इस द्वितीय दौज की कथा को कहा है। सतयुग में यह कथा विष्णु भगवान से, त्रेता में श्री राम के नाम से, द्वापर में श्री कृष्ण भगवान के नाम से एवं कलयुग मे (द्वापर का मोहन, त्रेता का राम) मोहन राम के नाम से यह कथा कही जाती है।
जो व्यक्ति अपने घर में नियम एवं संयम से व्रत करके खीर का भोग लगाकर इस व्रत को करेगा उसके घर में लक्ष्मी का वास होगा व उसके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। उसके घर मे कलि का वास नहीं होगा। जो व्यक्ति बाबा मोहन राम की दौज का जागरण करायेगा उस घर का दुखः दरिद्र दूर हो जायेगा तथा बाबा मोहन राम का वास हो जायेगा।
(इति धर्मबीज् व्रत, दौज व्रत कथा)









